यह लेख “श्री शनि देव जी की आरती” पर आधारित है, जिसमें शनि देव की महिमा, उनका आध्यात्मिक महत्व और आरती के माध्यम से उनकी उपासना के भाव को सरल एवं भक्तिपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसमें बताया गया है कि शनिदेव न्याय के देवता हैं जो कर्म के अनुसार फल देते हैं। उनके भक्त उन्हें शांत, न्यायप्रिय और भक्तवत्सल रूप में पूजते हैं।
आरती में शनि देव की दिव्यता, उनके वाहन (काग या गिद्ध), अस्त्र-शस्त्र, और नवग्रहों में उनकी विशेष भूमिका का वर्णन किया गया है। इस लेख में आरती के पाठ के साथ उसका अर्थ भी सरल शब्दों में समझाया गया है ताकि पाठक भावपूर्वक जुड़ सकें।
लेख का उद्देश्य न केवल आरती का पाठ प्रस्तुत करना है, बल्कि इसके माध्यम से शनि देव के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करना भी है। अंत में शनि देव की कृपा से जीवन में आने वाले कष्टों से मुक्ति और शांति की प्राप्ति की कामना की गई है।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥ जय.॥
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥ जय.॥
किरीट मुकुट शीश रजित दीपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥ जय.॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥ जय.॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥जय.॥
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